मैं ही पथिक, मैं ही पथ हूँ, मैं ही अपनी मंज़िल हूँ,
जिसको बाहर ढूँढ़ रहा था, भीतर ही वह सोना है।
जीत-हार की रेखाएँ पानी-सी बह जाती हैं,
अंत समय की मौन लिपि में सबको ही तो खोना है।
फिर भी जीवन शून्य नहीं, यह चेतन की धारा है,
गिर कर उठना, उठ कर गिरना — बस यूँ ही तो होना है।
#TwoLiners #Shayari
जिसको बाहर ढूँढ़ रहा था, भीतर ही वह सोना है।
जीत-हार की रेखाएँ पानी-सी बह जाती हैं,
अंत समय की मौन लिपि में सबको ही तो खोना है।
फिर भी जीवन शून्य नहीं, यह चेतन की धारा है,
गिर कर उठना, उठ कर गिरना — बस यूँ ही तो होना है।
#TwoLiners #Shayari
मैं ही पथिक, मैं ही पथ हूँ, मैं ही अपनी मंज़िल हूँ,
जिसको बाहर ढूँढ़ रहा था, भीतर ही वह सोना है।
जीत-हार की रेखाएँ पानी-सी बह जाती हैं,
अंत समय की मौन लिपि में सबको ही तो खोना है।
फिर भी जीवन शून्य नहीं, यह चेतन की धारा है,
गिर कर उठना, उठ कर गिरना — बस यूँ ही तो होना है।
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